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पापमोचनी एकादशी विशेषांक

"ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री"
ॐ नमो नारायण...पाप मोचनी एकादशी व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है. वर्ष 2021 में पापमोचनी एकादशी व्रत मंगवार 07 अप्रैल के दिन किया जायेगा.पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी पापों को नष्ट करने वाली होती है.स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने इसके फल एवं प्रभाव को अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत किया था.पापमोचनी एकादशी व्रत साधक को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोलती है.इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए.अगर कोई व्यक्ति इस पूजा को षोडशोपचार के रुप में करने पर व्रत के शुभ फलों में वृद्धि होती है.!

-:"पापमोचिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त":-
एकादशी प्रारंभ- 07 अप्रैल से मध्य रात्रि 02.09 मिनट से।
एकादशी तिथि समाप्त- 08 अप्रैल की सुबह 02.28 मिनट पर।
पारण का समय- 08 अप्रैल को दोपहर 01.39 मिनट से शाम 04.11 मिनट तक।

-:'पाप मोचनी एकादशी व्रत विधि":-
पाप मोचनी एकादशी के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है.इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है,व्रती दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करे और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए. एकादशी के दिन सूर्योदय काल में स्नान करके व्रत का संकल्प करना चाहिए संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें.पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करना चाहिए. एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें.द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए.!

-:"पापमोचनी एकादशी व्रत कथा":-
महर्षि लोमश ने कहा: हे नृपति.! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचिनी एकादशी है,उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं,मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो.!

प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था,उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं,वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था,अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे,कभी गन्धर्व कन्‍याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे.!

उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे,वे शिवभक्त थे,एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की, इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी.!

उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे,कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया,कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया,इस तरह कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने को तैयार हुआ.!

उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे,उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारण कर रखा था,वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे,उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए,वह अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी.! महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे.!

काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे,तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली: हे ऋषिवर.! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये.!

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा: हे मोहिनी.! सन्ध्या को तो आयी हो,प्रातःकाल होने पर चली जाना.!
ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी,इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया.!
मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा: हे विप्र.! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये.!
मुनि ने इस बार भी वही कहा: हे रूपसी.!अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है,कुछ समय और ठहरो.!
मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा: हे ऋषिवर.! आपकी रात तो बहुत लम्बी है,आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया,अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है..?
अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे,जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन (57) वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे.!
इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया,अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे,क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं.!
क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा: मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा,तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है। अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा.!
मुनि के क्रोधयुक्त श्राप से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई,यह देख वह व्यथित होकर बोली: हे ऋषिवर.!अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस शाप का निवारण किस प्रकार होगा.? विद्वानों ने कहा है,साधुओं की सङ्गत अच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं,अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए,अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा.!

मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ,अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा: तूने मेरा बड़ा बुरा किया है,किन्तु फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ,चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है,उसका नाम पापमोचिनी है,उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी.!

ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया,फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये.!
च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा: हे पुत्र.! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं.? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है.?
मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा: पिताश्री.! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है,इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं,कृपा करके आप इस पाप से छूटने का उपाय बतलाइये.!

ऋषि ने कहा: हे पुत्र.! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे.!
अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया,उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए.!
मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई.!
लोमश मुनि ने कहा: हे राजन! इस पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं,इस एकादशी की कथा के श्रवण व पठन से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है,इस उपवास के करने से ब्रह्म हत्या करने वाले,स्वर्ण चुराने वाले,मद्यपान करने वाले,अगम्या गमन करने वाले आदि भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है.!

-:"पापमोचनी एकादशी व्रत महत्व":-
पापमोचनी एकादशी को सभी पापों को हरने वाली एकादशी भी कहा जाता है.पुराणों के अनुसार पापमोचनी एकादशी को व्रत रखना बेहद फलदायी माना गया है.कहा जाता है कि विकट से विकट स्थिति में भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से श्री हरि की कृपा प्राप्त होती है.कहा जाता है कि एकादशी के व्रत से चंद्रमा के हर खराब प्रभाव को रोका जा सकता है.इस व्रत का सीधा प्रभाव मन और शरीर पर पड़ता है. इसका व्रत रखने से मन के सभी बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं.!
चैत्र मास की यह एकादशी श्री हरि की कृपा पाने के लिए बेहद शुभ दिन होता है.व्यक्ति के सारे पापों को नष्ट करने की क्षमता के कारण ये पापमोचनी एकादशी कहलाती है. इस दिन उपवास करने से व्यक्ति पाप मुक्त हो सकता है और उसे संसार के सारे सुख प्राप्त हो सकते हैं.पापमोचनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पीले फुलों से पूजा करने पर उनकी कृपा बरसती है.इस दिन नवग्रहों की पूजा करने से शुभ परिणाम की प्राप्ति होती है.

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